भगवान विष्णु दर्शन – एक सत्य घटना ! Bhagwan vishnu darshan | chamatkarik kahani

भगवान विष्णु दर्शन - एक सत्य घटना ! bhagwan vishnu ka darshan

 

भगवान विष्णु दर्शन – एक सत्य घटना !

ये सत्य घटना उस समय की है जब हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी के दौर से गुजर रहा था । देश के नागरिकों को गुलाम बनाने के लिए युवाओं को उनकी संस्कृति और उनके देश के गौरवशाली इतिहास से दूर किया जा रहा था । हिन्दू धर्मशास्त्र लगभग जर्जरीभूत हो चुके थे । उस समय एक महान भक्त और गृहस्थ संत हुए जिन्होंने भगवान के साक्षात दर्शन किये । और देवर्षि नारद व महर्षि अंगिरा के आशिर्वाद भी पाये ।

आज शायद ही कोई देशवासी होगा जो उन महान संत ‘हनुमान प्रसाद पोद्दार जी’ को न जानता हो । जिनका नाम गीताप्रेस गोरखपुर को स्थापित करने कारण भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व में प्रसिद्ध है । गीताप्रेस उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर में स्थित है।

उनके जीवन की अनेकों दिव्य घटनाएँ लोक प्रसिद्ध है । उन्हीं में से एक घटना उन दिनों की है जब देश की आजादी के लिये भाईजी ने महान क्रांतिकारीयों के साथ आंदोलन में भाग लिया था । आजादी के आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें भी क्रान्तिकारीयों के साथ जेल जाना पडा । जेल में भी भाईजी ने प्रभु स्मरण नहीं छोडा तथा वे नित्य भगवन्नाम जप व गीतापठन किया करते थे । ऐसे ही एक दिन जब वे सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने भजन संध्या में लीन थे, तभी उन्हें अचानक एक दिव्य तेज ! प्रकाश पुंज ! दिखाई दिया । देखते ही देखते वो प्रकाश चतुर्भुजी श्रीहरि नारायण के रूप में बदल गया, अपने प्रभुके साक्षात दर्शन पाकर भाईजी की आँखें भक्तिभाव छलक पडी । वे बडे भाव से भगवान की स्तुती करने लगे । भगवान ने भी उन्हें प्रेम आशीष देते हुए प्राचीन वेद और शास्त्रों का जीर्णोद्धार करने का आदेश दिया ।

भाईजी ने कहा – हे प्रभु ! आपकी आज्ञा तो शिरोधार्य है । परंतु इसके लिए न मेरे पास न धन है न ही कोई मार्गदर्शन ।

श्रीहरि मन्द मन्द मुस्कुराये औऱ बोले – महर्षि नारद औऱ अंगीरा ऋषि आकर तुम्हारा मार्गदर्शन और आशिर्वाद किया की तुम्हें इस दैवीकार्य में कभी धन कि कमी न पडेगी ।

कहते हैं इस संवाद के कई और भी उनके क्रान्तिकारी साथी प्रत्यक्ष दर्शी थे । इसके कुछ समय बाद जब वे जेल से छुटकर घर वापिस आये तो एक समय जब वे प्रातः संध्यावंदन कर रहे थे तभी देवर्षि नारद और महर्षि अंगिरा रूप बदलकर उनके पास आये । जिन्हें भाईजी जैसे भक्त ने देखते ही पहचान लिया औऱ उनके चरणों में सादर प्रणाम किया । बडे आदर के साथ उन्हें अंदर ले गये । उस समय महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारद ने जिस जगह पर बैठकर भाईजी से संवाद किया वो स्थान आज भी गोरखपुर राधाकृष्ण मंदिर में स्थित है । जिस जगह पर देवर्षि पधारे थे वहाँ अब मन्दिर का निर्माण हो चुका है । कहते हैं भाईजी को देवर्षि और अंगीरा ऋषि ने भगवान की आज्ञा दुबारा दोहराते हुए गीताप्रेस की स्थापना करने का आदेश दिया था । गौरखपुर के उस दिव्य स्थान का दर्शन करने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ ।

ऐसा कहा जाता है उस समय उन्हें इस दैवीकार्य के लिए जो प्रथम चैक प्राप्त हुआ था उस पर हस्ताक्षर देख स्वयं भक्तराज भी चकित हो गये थे, क्योंकि उस चैक पर हस्ताक्षर ‘भगवान’ और इस तरह प्रारंभ हुआ गीताप्रेस गौरखपुर का सफर । जो आज पूरे विश्व में दिव्य हिन्दू संस्कृति के सभी ग्रंथों को प्रकाशित करती है तथा हमारे देश के युवओं को अपने देश के महान इतिहास से भी परिचित करवाती है । यह जगह आज भी राधा कृष्ण मंदिर के गीता वाटिका के बगीचे में बिद्यमान है, जहाँ पर दूर दूर से लोग इस जगह चमत्कारी जगह के दर्शन करने आते है ।


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