National Unity Day: लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की संक्षिप्त जीवनी (ऑडियो सहित) | Sardar Vallabhbhai Patel – Short Biography in hindi

Written by vedictale

October 20, 2021

National Unity Day-लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल

 

भारत देश की आजादी, अखंडता और अस्मिता की नींव थे – ‘‘लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल !’’ इन्होंने देश की आजादी में और आजादी के बाद भी देश को एकजुट करने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमीका निभाई थी । ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की आज हम जिस अखंड भारत में जी रहे है, उसकी अखंडता हमारे लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की ही देन है । अगर वो न होते तो आज भारत देश खंड-खंड में बिखरा होता । आईये जानते हैं सरदार वल्लभभाई पटेल के संक्षिप्त जीवन चरित्र व भारत देश के लिए उनके महत्वपूर्ण योगदान के बारे में ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म कहाँ हुआ था ?

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म ३१ अक्टूबर सन १८७५ को गुजरात के नडियाद जिले में एक लेवा पटेल परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम श्री झवेरभाई पटेल एवं माता का नाम श्रीमति लाडबा देवी पटेल था । ये अपने पिता की चौथी संतान थे । ये चार भाई थे, सोमाभाई, नरसीभाई, विट्टलभाई, और सरदार वल्ल्भभाई पटेल । 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी । सरदार वल्ल्भभाई पटेल ने लन्दन जाकर बैरिस्टर की पढाई की थी । लन्दन से लौटकर सरदार पटेल अहमदाबाद में वकालत करने लगे । वल्लभ भाई की शादी झबेरबा से हुई । सरदार पटेल जब सिर्फ 33 साल के थे, तब उनकी पत्नी का निधन हो गया । भारत देश में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित होकर । उन्होने भारत देश की आजादी के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देश के लिए क्या किया ?

भारत देश का बच्चा-बच्चा भी सरदार वल्लभ भाई पटेल के देश के लिए दिये गये बलिदान और साहसिक कार्यों से चिरपरिचित है । लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई झावेरभाई पटेल जो लौहपुरुष सरदार पटेल के नाम से लोकप्रिय थे, एक दूरदृष्टा और विलक्षण भारतीय राजनीतिज्ञ भी थे । उन्होंने भारत देश के पहले उप-प्रधानमंत्री के रूप में भी कार्य किया था । सरदार पटेल ने भारत के राजनीतिक एकीकरण और 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान गृह मंत्री के रूप महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । जिसे भुलाया नहीं जा सकता । सरदार वल्ल्भभाई पटेल ने राष्ट्रिय एकीकरण करके एकता का एक ऐसा स्वरूप दिखाया, जिसके बारे में कोई स्वप्न में भी सोच भी नहीं सकता । उनके इसी साहसिक कार्य और विलक्षण सोच के कारण उनके जन्म दिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

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क्यों सरदार वल्लभ भाई पटेल लौह पुरुष कहा जाता है?

जब भारत देश को अंग्रेजों से आजादी मिली तब भारत देश की बहुत सी रियासतों ने अपने को स्वतंत्र रियासत घोषित कर लिया और स्वयं ही वहाँ के नवाब बन बैठे और अपने ही कानून चलाने लगे । गृहमंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता उस समय देश की बिखरी रियासतों (राज्यों) को अखंड भारत में मिलाना था । इस काम को उन्होंने बिना खून बहाए करके भी दिखाया । केवल हैदराबाद के ‘ऑपरेशन पोलो’ के लिए उन्हें सेना भेजनी पड़ी थी । सरदार वल्लभभाई पटेल की दृढ़ इच्छा शक्ति और कुशल नेतृत्व कौशल का ही ये कमाल था, कि 565 रियासतों को, अखंड भारत देश के रूप में विलय कर दिया गया । भारत के एकीकरण में उनके इस महान योगदान के लिए उन्हे भारत का ‘लौहपुरुष’ के रूप में जाना जाता है । विश्व के इतिहास में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं हुआ, जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो । भारत के प्रथम गृह मंत्री और प्रथम उप प्रधानमंत्री के रूप में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई । उनके इन्हीं साहसिक कार्यों की वजह से ही उन्हें लौह पुरुष और सरदार जैसे विशेषणों से संबोधित व सन्मानित किया गया ।

स्वतंत्र भारत में सरदार पटेल का सबसे बड़ा योगदान क्या था?

सरदार पटेल कभी अन्याय सहन नहीं कर पाते थे । स्कूली दिनों से ही उन्होंने अन्याय का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया था । एक बार जब वे  नडियाद स्कूल में पढते थे तब की बात है । उनके स्‍कूल के अध्यापक पुस्तकों का व्यापार किया करते थे और छात्रों को पुस्तकें बाहर से न खरीदकर उन्हीं से लेने के लिए बाध्य किया करते थे । वल्लभभाई ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और इसका विरोध किया छात्रों को जागरुक किया । परिणामस्वरूप अध्यापकों और विद्यार्थियों में संघर्ष छिड़ गया । 5-6 दिन स्‍कूल भी बंद रहा । परंतु अंत में जीत सत्य की ही हुई । सरदार वल्लभ भाई के कारण अध्यापकों का प्राईवेट व्यापार बंद हो गया ।

सरदार पटेल को अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पडा । उन्होंने 22 वर्ष की उम्र में 10वीं की परीक्षा पास की थी । सरदार पटेल का सपना था वकील बनने का और अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें इंग्लैंड जाना था, लेकि‍न उनके पास इतनी आर्थिक सुविधाएँ नहीं थी, कि वे एक भारतीय महाविद्यालय में भी प्रवेश ले पायें । उन दिनों एक उम्मीदवार ही व्यक्तिगत रूप से पढ़ाई करके वकालत की परीक्षा दे सकता था । ऐसे में सरदार पटेल ने अपने एक परिचित वकील से पुस्तकें उधार लीं थी और घर पर ही अपनी पढ़ाई प्रराम्भ कर दी थी । जिसे उन्होंने कठिन परिस्थितियाँ होने के बावजूद भी वकालत की पढाई पूरी कर ली ।

बारडोली सत्याग्रह में सरदार पटेल ने अहम भूमिका निभाई थी । जिसके कारण वहां की महिलाओं ने उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी थी । आजादी के बाद विभिन्न रियासतों में बिखरे हुए भारत के भू भाग को अपनी विलक्षण राजनीति के कारण ही सरदार पटेल ने एक सूत्र में पिरो दिया था । इस भारतीय एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए सरदार पटेल को ‘भारत का बिस्मार्क’ और ‘लौहपुरुष’ भी कहा जाने लगा । सरदार पटेल ने ही सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण भी करवाया था । सरदार पटेल हमेशा वर्णभेद तथा वर्गभेद के कट्टर विरोधी थे । वे सभी को समान दृष्टी से देखते थे ।

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इंग्‍लैंड में वकालत की पढाई पूरी करने के बाद भी उनका मन पैसा कमाने की तरफ नहीं था । सरदार पटेल 1913 में भारत लौट आये । जल्द ही वे साहसिक कार्यों से लोकप्रिय हो गए । अपने मित्रों के कहने पर सरदार पटेल ने 1917 में अहमदाबाद के सैनिटेशन कमिश्नर का चुनाव लड़ा और उसमें उन्हें जीत मिली ।

जब 1918 में गुजरात राज्य के खेड़ा खंड में सूखा पड़ा । तो किसानों ने करों में राहत की मांग रखी । लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उस मांग को ठुकरा दिया । तब सरदार पटेल ने आगे बढकर किसानों का ये मुद्दा उठाया, ब्रिटिश सरकार के विरोध आंदोलन किया । सरदार पटेल स्वेच्छा से आगे आकर इस संघर्ष का नेतृत्व किया था ।

भारत देश विश्व का सिरमौर बनाने और भारत को ऊँचाईयों तक ले जाने के लिए उन्होंने बहुत प्रयास किये और बहुत बलिदान भी दिये । अब इसे भारत देश का दुर्भाग्य ही कहें की जनता के लोकप्रिय होने के बावजूद, जनता के  बहुमत से विजय होने के बावजूद भी, सरदार वल्लभभाई पटेल एकमात्र गांधी जी की इच्छा के कारण प्रधानमंत्री न बन सके । वरना पूर्ण बहुमत से देश के पहले प्रधानमंत्री लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ही होते ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारत रत्न कब दिया गया?

सरदार पटेल के स्वर्गवास के 41 वर्ष बाद 1991 में उन्हें भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान भारतरत्न से भी नवाजा गया । यह अवॉर्ड उनके पौत्र विपिनभाई पटेल ने स्वीकार किया था ।

वल्लभ भाई पटेल की मृत्यु कब हुई थी?

सरदार वल्ल्भ भाई पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 में मुंबई में हार्ट अटैक आने के कारण हुआ था । वे ईमानदार और सच्चे देशप्रेमी व्यक्ति थे । एक छोटी सी बात से ही सरदार पटेल की देश के प्रति समर्पण भाव, ईमानदारी और उनकी देशप्रेम की भावना का पता चल जाता है कि सरदार पटेल का जब निधन हुआ, तब उनके बैंक खाते में सिर्फ 260 रुपए मौजूद थे । उनके पास खुद का मकान भी नहीं था । वे अहमदाबाद में किराए एक मकान में रहते थे । इसके विपरीत ऐसा सुना गया है कि सरदार पटेल के ही समकालीन भारत देश के कुछ अय्याश नेताओं के तो कपडे भी धुलकर विदेशों से प्लेन द्वारा आते थे । जनता की भुखमरी या पीडा से उन अय्याश नेताओं का कोई लेना देना तक नहीं था । न जाने कितनी अराजकता और घोटालों को सहा है इस भारत देश की जनता ने । जनता के मूँह से भी निवाला छीनकर ये चंद गद्दार नेता भारत देश के पैसों को घोटालों के द्वारा स्वीस बैंकों में भरते रहे । अगर सरदार पटेल जैसे नेता उस समय भारत देश के प्रथम प्रधानमंत्री हो गये होते तो आज भारत देश जिन उचाइयों पर पहुँच रहा है । वो बहुत पहले ही पहुँच चुका होता और विश्व की महाशक्ति होता ।

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सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति: Statue of Unity

‘लौहपुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल की जितनी भी सराहना की जाय वो कम ही होगी । उनका भारत देश सदैव ऋणी रहेगा । उनके भारत देश के प्रति समर्पण और योगदान को देखते हुए । प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी द्वारा विश्व में रिकोर्ड बनाते हुए, सरदार वल्लभ भाई पटेल के जन्मदिन पर, 182 मीटर ऊंची विशाल प्रतिमा व उनका स्मृति स्मारक गुजरात राज्य के भरूच में नर्मदा के सरदार सरोवर बांध के सामने निर्माण किया गया है । इस प्रतिमा का नाम एकता की मूर्ति (स्टेच्यू ऑफ यूनिटी) रखा गया है ।

सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन परिचय से यह पता चलता हैं कि मनुष्य महान बनकर पैदा नहीं होता । सतकर्म के पथ पर आगे बढ़ते बढ़ते वो महान पुरुष बन जाता है जैसे गुजरात राज्य में जन्मे ये वीर वल्लभभाई पटेल से सरदार वल्लभ भाई पटेल और लौह पुरुष वल्लभभाई पटेल बन गए । इतिहास सदियों तक इनके बलिदान को याद रखेगा ।


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